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Friday, 21 September 2018

अंधी दौड़

वक़्त कुछ यूँ गुजरा
निशां पैरों के मिटते गए
अक्श धुंधलाता गया
' हम ' से तुम हुए
इधर में ' मैं ' भी हुआ
इक रोज ख़बर आयी तुम्हारे जाने के
चंद रोज बाद ख़बर फैली मेरी भी
अर्थ निकला न कोई आने का
गिनने दरम्यां दूरियों को जब निकले
वक़्त कुछ  यूं फिसलता ही गया
मायने दरम्यां जिंदगानी के देखे न गये ।

Monday, 2 April 2018

पैग़ाम

ये मिरे मुल्क को हुआ क्या है
उठा है ये जो धुँआ , जला क्या है ।
उतर आता है सड़क पर बात - बात पर ,
रास्ता  इसका कहीं खो सा गया है ।
चलो इक मशविरा करते हैं
समय रहते , अभी बिगड़ा ही क्या है ।
उम्मीद करें के
घर , दुकाँ , बस अब और न जले
भटके का , घर अभी इंतजार करता है ।
नहीं चाहिए निवाला तुम्हारे कौर का
तुम्हारी मुस्कान से ही पेट मिरा भर गया है ।
तुम भी ढूंढ़ लेना खुशियाँ औरों की खुशियों में
यही तो मेरे पुरखों का पैग़ाम रहा है ।