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Wednesday, 23 September 2015

माँ

 सिहर जाता हूँ
 तेरी कमी की सोच कर ही ,
 हो जाता हूँ
 सजग , उनके
 लिए , जिनके
 पास तू नहीं ।

 आखिर
 हूँ , क्यों नहीं
 एक
 तू ही तो आती है
 आखिरी मैं
 मुझ गिरे को उठाने
 आंसू पौंछने
 जब
 कोई नही होता , पास मेरे ।

 तेरे माथे की सिलवटैं
 देती हैं सम्बल मुझे , कि
 हूँ नही अकेला मैं
 सोचने वाला , मेरे बारे मैं
 सोते  ,जागते , काम करते
 तू भी तो घुनती है
 साथ मेरे ।

 हाँ ! हो जाता हूँ
 भ्रमित कभी
 लेकिन
 है फीका , सबका प्यार तेरे आगे ।

 माँ !!!!
 तू बहुत याद आती है ।

Saturday, 19 September 2015

अंतर विरोध

 अंतर विरोध
 नीम का कटु स्वाद औ मधुर गंध
 वैसे ही ...... अनवरत
 तुम्हारे  प्यार का रूप सुन्दर औ कठोर स्पर्श ।
  

अमिट छाप

 हवा के झोके आये बहुत
 मगर
 कोई टिक न सका ........ तेरी हिलायी डाली पर
 न कोई कोयल बैठी
 न कभी बौर आया ....
 बाहर से हरी सूखी डाली पर ।

प्रतिलोमी

 दो ध्रुव धरती के
 ठीक वैसे ही ...... जैसे
 मैं और तुम
 एक हो नहीं सकते
 दूर जा नहीं पाते ।

सर्वव्यथा

ढूंढता मैं , मुझे इस भीड़ में
वादा किया जिसने कल बिखरने का।

ख्वाइश

 नहीं चाहिये ............ तुम्हारे
 सुर्ख होठों की छुवन ,
 नर्म त्वचा का स्पर्श ,
 औ ............. ना ही
 तपती देह की ऊष्मा
 चाहिये .............. सिर्फ
 तुम्हारा शिकन हीन चेहरा ,
 सदाबहार मुस्कान के फूल ।

वो तुम थी

 सोते को जगाया
 रोते को हँसाया
 पढ़ाई की टेबल पर बैठे के
 कान मैं की कू  ! ! ! ! !
 हालांकि
नहीं दी कभी दिखायी
 लेकिन
 वह तुम थी
 हाँ ! हाँ  तुम ही तो थी.......