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Friday, 21 September 2018

अंधी दौड़

वक़्त कुछ यूँ गुजरा
निशां पैरों के मिटते गए
अक्श धुंधलाता गया
' हम ' से तुम हुए
इधर में ' मैं ' भी हुआ
इक रोज ख़बर आयी तुम्हारे जाने के
चंद रोज बाद ख़बर फैली मेरी भी
अर्थ निकला न कोई आने का
गिनने दरम्यां दूरियों को जब निकले
वक़्त कुछ  यूं फिसलता ही गया
मायने दरम्यां जिंदगानी के देखे न गये ।

Monday, 2 April 2018

पैग़ाम

ये मिरे मुल्क को हुआ क्या है
उठा है ये जो धुँआ , जला क्या है ।
उतर आता है सड़क पर बात - बात पर ,
रास्ता  इसका कहीं खो सा गया है ।
चलो इक मशविरा करते हैं
समय रहते , अभी बिगड़ा ही क्या है ।
उम्मीद करें के
घर , दुकाँ , बस अब और न जले
भटके का , घर अभी इंतजार करता है ।
नहीं चाहिए निवाला तुम्हारे कौर का
तुम्हारी मुस्कान से ही पेट मिरा भर गया है ।
तुम भी ढूंढ़ लेना खुशियाँ औरों की खुशियों में
यही तो मेरे पुरखों का पैग़ाम रहा है ।

Friday, 25 August 2017

कालिख़

  आज फिर से कहीं धुँआ उठा होगा ,
  लगता है ,
  जरूर दूर किसी बच्चे की चिता जली होगी,
  वरना ,
  क्यूंकर मेरा आँगन काला होता ।
  सुलगी होगी आग दूर कहीं ,
  लगता है , 
  हुँकार जरूर किसी ढोंगी ने भरी होगी ,
  वरना ,
  क्यूंकर इक बेटी , भाई , माँ , बाप अपने ही खिलाफ 
  खड़े होते । 
  

  ( यहां ढोंगी  धार्मिक , साम्प्रदायिक , राजनीतिक        सभी प्रकार के शामिल हैं । )

Wednesday, 2 August 2017

रुख़

  मेरे 'खुरदरेपन'  को न यूँ ठुकराइये साहिब
  इसमें भी जिंदगी बसती है
  कभी फुरसत मिले , तो
  सहलाकर देखना किसी रूख़ के तने को
  उसकी सांसें बहती दिख जाएंगी ।

   वो तो हमारी खुद्दारी ही है
  जो हमेशा 'मुस्कराये' रखती है हमें ,
  गर मुलायम होते
  तो  , कब के चब गये होते ।

 अब तुम ही कहो
 कैसे हम चुप रह , दरख़्त न बनें ।

Monday, 15 August 2016

अधूरापन

  आधा ,
  सच है
  रहता है , सब में
  मुझमें भी , तुम में भी
  भाग नहीं सकते
  इससे , व्यापा है यह कण कण में
  अधूरे आधे की अथक तलाश
  ही , आधे की तलब है
  आधा , जिन्दा है
  आधे की तलाश जिन्दी है
  क्योंकि
  आधा सच है ।

Wednesday, 23 March 2016

अंतहीन कल

      मैं ,
      फिर  - फिर  लौट जाता हूँ ,
      हर बार
      आज से  , अभी से ,
      अतीत के बुलावे पे ,
      जो ,
      रहेगा ही ,
      कल में  भी । 

Saturday, 13 February 2016

कैद

  चलो ,
  कैद  कर दें  खुद  को  ही  अपने बुत  में
  कहीं ,
  खाली  पाकर  प्रेत  न  बस  जायें  इसमें  ।