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Friday, 25 August 2017

कालिख़

  आज फिर से कहीं धुँआ उठा होगा ,
  लगता है ,
  जरूर दूर किसी बच्चे की चिता जली होगी,
  वरना ,
  क्यूंकर मेरा आँगन काला होता ।
  सुलगी होगी आग दूर कहीं ,
  लगता है , 
  हुँकार जरूर किसी ढोंगी ने भरी होगी ,
  वरना ,
  क्यूंकर इक बेटी , भाई , माँ , बाप अपने ही खिलाफ 
  खड़े होते । 
  

  ( यहां ढोंगी  धार्मिक , साम्प्रदायिक , राजनीतिक        सभी प्रकार के शामिल हैं । )

Wednesday, 2 August 2017

रुख़

  मेरे 'खुरदरेपन'  को न यूँ ठुकराइये साहिब
  इसमें भी जिंदगी बसती है
  कभी फुरसत मिले , तो
  सहलाकर देखना किसी रूख़ के तने को
  उसकी सांसें बहती दिख जाएंगी ।

   वो तो हमारी खुद्दारी ही है
  जो हमेशा 'मुस्कराये' रखती है हमें ,
  गर मुलायम होते
  तो  , कब के चब गये होते ।

 अब तुम ही कहो
 कैसे हम चुप रह , दरख़्त न बनें ।