मेरे 'खुरदरेपन' को न यूँ ठुकराइये साहिब
इसमें भी जिंदगी बसती है
कभी फुरसत मिले , तो
सहलाकर देखना किसी रूख़ के तने को
उसकी सांसें बहती दिख जाएंगी ।
वो तो हमारी खुद्दारी ही है
जो हमेशा 'मुस्कराये' रखती है हमें ,
गर मुलायम होते
तो , कब के चब गये होते ।
अब तुम ही कहो
कैसे हम चुप रह , दरख़्त न बनें ।
इसमें भी जिंदगी बसती है
कभी फुरसत मिले , तो
सहलाकर देखना किसी रूख़ के तने को
उसकी सांसें बहती दिख जाएंगी ।
वो तो हमारी खुद्दारी ही है
जो हमेशा 'मुस्कराये' रखती है हमें ,
गर मुलायम होते
तो , कब के चब गये होते ।
अब तुम ही कहो
कैसे हम चुप रह , दरख़्त न बनें ।
No comments:
Post a Comment