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Wednesday, 23 September 2015

माँ

 सिहर जाता हूँ
 तेरी कमी की सोच कर ही ,
 हो जाता हूँ
 सजग , उनके
 लिए , जिनके
 पास तू नहीं ।

 आखिर
 हूँ , क्यों नहीं
 एक
 तू ही तो आती है
 आखिरी मैं
 मुझ गिरे को उठाने
 आंसू पौंछने
 जब
 कोई नही होता , पास मेरे ।

 तेरे माथे की सिलवटैं
 देती हैं सम्बल मुझे , कि
 हूँ नही अकेला मैं
 सोचने वाला , मेरे बारे मैं
 सोते  ,जागते , काम करते
 तू भी तो घुनती है
 साथ मेरे ।

 हाँ ! हो जाता हूँ
 भ्रमित कभी
 लेकिन
 है फीका , सबका प्यार तेरे आगे ।

 माँ !!!!
 तू बहुत याद आती है ।

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